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  • दिल की जुबाँ ......ऐसी भी

    20 August 2015

    शायद दिल की जुबाँ समझने का दिल हो रहा होगा, खामोशियों ने भी नींदों में कुछ तो कहा होगा, कोई मुद्दत बाद जागा होगा जो सो रहा होगा, कंही नसीब अपने अंजाम पर भी रो रहा होगा, दिल से निकली आहों का बयां कंही हो रहा होगा, समझ कर जबाँ दिल की कोई दर्द सह रहा हो...

  • हिन्द में पाकिस्तान के परचम फहराने का अंजाम

    21 August 2015

    सर कलम कर देना होगा उस नामुराद खबीज़ का, जो हमारे वतन का खा पहन कर हो ना पाया ज़मीर का, तिरंगे के अलावा गर हाथों में पाक का परचम दिखे, हाथ काट दिए जाएँ, जिस्म टाँग दो चौराहे पर, सबक हो जाए गद्दारों के लिए, फौजियों को सलाम हो वीर का जय हिन्द

  • माँगा कुछ यूँ...... रब से

    26 August 2015

    खुदा मेरे सोचने की सीमायें असीमित कर दे, दिल को रूहानियत के एह्साश से भर दे, लफ्ज़ निकले तो लोगों करार पहुंचे, मिल के हो जाए शख्सियत बेक़रार वो कर दे, लिखूं आसमा तो जमी साथ देती मिले, छू लूँ गर आग तो हवा साथ देती मिले , तेरा ही अक्स नज़र आये पढ़ कर जो याद...

  • दर्द की डगर.....ऐसी भी

    26 August 2015

    अब याद नहीं रखता के गम क्यूँ है, ज़िन्दगी हवाले कर दी करम यूँ है. तभी तो गम से भी याराने हो गए, वो जो गम देने आये खुद ठिकाने हो गए, एक ठंडक सी आँखों में उभर जाती है, साँस अब इत्मीनान से आती है जाती है, शिकवों से भी तौबा हो चली अब तो, उनकी तड़प पर हमारी...

  • दलितों को........ दलित कहने पर

    27 August 2015

    इस दर्द से गुजरते गुजरते देख कहा तक आ गए, इतना बदलकर भी देखा तो जख्म हरा ही पा गए वो कहते मिले के हमने तुम्हे इंसान माना, जो थे आज इंसानियत बेच कर खा गए, खुदा ही जाने तुझे वो अगला जन्म क्या देगा, इंसान यक़ीनन नहीं बनाएगा काफी है जीव का जन्म गर पा गए

  • हुस्न .......रवायत

    29 August 2015

    क्यों न खुद पर कुछ करम किया जाये, खुद को संवार कर नज़रबंद किया जाये चंद महकते गुलों से एै दोस्त, खुशबुओं को फिर से हुनर मंद किया जाए,

  • प्रेम ......पांति

    29 August 2015

    प्रेम के हो जाने से लिखे जाने तक, अश्क के बहने से मुस्कराने तक, इंतज़ार के लम्हों को मुकम्मल पाने तक, धड़कनों के राग बदलते जाते हैं, दिलों की बस्तियों पर सहर आने तक, बीत जाती है उम्र लौट कर घर आने तक चंद दिनों में जीता है एक उम्र हर एक, मुहब्बत बदलती जाती...

  • मोहब्बत की..... नींदें

    29 August 2015

    नींद तुझे आ जाये ये मुमकिन तो है, याद करे मुझे और जाग जाए ये मुमकिन तो है, फिर करवटों में रात बीते ये मुमकिन तो है, सुबह कोई मिलने आये ये मुमकिन तो है

  • ठेस लगे........ जज्बात

    30 August 2015

    बहुत दूर जी कर सोचा तो था पाया हमने, कोई ठेस भीतर ही भीतर सुलग रही है यूँ, तमन्नाएँ पूरी होकर भी लगती है राख, एक चिंगारी फूंक रही है तेरी मोहब्बत ज्यूँ होने को तो सब कुछ था ही मगर, वो जो तीखी बात कह दी थी रह गयी है क्यूँ

  • साये और....... तन्हाई

    30 August 2015

    रेतों पर चलना सायों का मचलना, ज़रा आपका रुकना धुप का सम्हलना, अक्श याद आना आपका मुस्कराना, क़दमों को दोस्त जरा हौले बढ़ाना, मुश्किल बहुत है इश्क को भूल पाना, तन्हाइयों से सीखा है हमने गुनगुनाना

  • सलाम से ...... खताओं तक

    31 August 2015

    अब ना दुआ होगी दोस्त ना सलाम, हम हैं खतावार हमें खताओं से फकत काम, खताओं की आरजू भी रखता ही होगा कोई, काफी दिन बीते लगा के किस्सा ना हुआ कोई मैंने खतायें छोड़ दी जबसे, उसने सजा ना दी कोई, यूँ लग रहा है बेमने से ही अपना बना कोई, आजाद कर लिया खुद को या आजाद...

  • बदलते रंग....... इश्क के

    07 September 2015

    ये शरारत की अदा देखि ना गयी मुझसे, कहो तो गुस्ताख़ होकर शरारत करूँ कोई, आपकी आँखे हसीं तो हैं ही, और हंसी हो जाएंगी कहो तो अश्क भरू कोई जो मुस्कराहट लबों पर दर्द छुपा कर आती है, उसकी तस्वीर दर्द बोलती जाती है, ख़ुशी में मुस्कराती तस्वीर की एै दोस्त, हर...

  • गणेशा तेरे .......स्वागत में

    08 September 2015

    वो कहते हैं अब ना वफ़ा का जिक्र होगा, ना वफ़ा की बात होगी, जिससे भी मोहब्बत होगी , गणेशउत्सव के बाद होगी, वो नादान नहीं जानते,दोस्त, वफ़ा का जिक्र भी होगा, मोहब्बत की बात भी होगी, गणेशउत्सव से होगी वफ़ा, मोहब्बत गणेशा के साथ होगी

  • लेखन की .......दास्ताँ

    09 September 2015

    उम्र गुजरी हुनर कोई ना हाथ आया, पेट भरना ना हो सका खुद को सिकस्त पाया, जाने कौन घडी थी जब ये कलम उठाई, खुदा ने शायद जज्बात लिखने को था कागज़ बनाया, कुछ दिए एह्साश जिसको मैं लिख तो पाया, ज़िन्दगी में सिक्कों की कमी कोई भर ना पाया, किसी लिखने वाले की दास्ताँ...

  • ख़ुशी के....... रंग

    16 September 2015

    खुश तो कम ही मिलेंगे जमाने से, शायद थक गए हो निभाने से, कुछ शिकवे भी होंगे ज़माने से, बात बन जायेगी दो कश लगाने से, एक ज़िन्दगी का हो दूसरा दोस्ती का, थोड़ा जाम गम का हो थोड़ा ख़ुशी का, चल यार अब दिल्लगी छोड़ भी दे बहाने से, आ नींद से सुबह मांग लें ठिकाने...

  • (ओहदों की दास्ताँ)

    18 September 2015

    ओहदों ने इंसान के हाथ काट लिए हैं दोस्त, कम ही होते हैं जिनके हाथ सलामत होते हैं, मगरूर तो हो ही जाते है सभी बनकर , कम ही होते हैं जो बनकर मगरूर ना होते हैं, कुछ होते हैं जो बढ़कर सर पर रखते हैं हाथ, वो याद तो आते ही हैं मगर दुआओं में भी अक्सर होते है...

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