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18 Sep

(ओहदों की दास्ताँ)

Published by Sharhade Intazar Ved

(ओहदों की दास्ताँ)

ओहदों ने इंसान के हाथ काट लिए हैं दोस्त,
कम ही होते हैं जिनके हाथ सलामत होते हैं,

मगरूर तो हो ही जाते है सभी बनकर ,
कम ही होते हैं जो बनकर मगरूर ना होते हैं,

कुछ होते हैं जो बढ़कर सर पर रखते हैं हाथ,
वो याद तो आते ही हैं मगर दुआओं में भी अक्सर होते हैं

Comment on this post

monika 09/22/2015 10:53

वाह। क्या बात कही
बहुत बढ़िया