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मौत ..........जाते जाते

जख्मी हो जाते हैं दफनाते वक़्त हाथ जिनके, अँधेरे आसुओं में बह जाते हैं दिन रात उनके, यादें तो परछाई हो ही जाया करती हैं, लगा के जो रखते हैं दिल से जज्बात उनके, फिर वक़्त के साथ बदल जाती है परछाइयाँ, नए हो जाते हैं जज्बात और नए हालात उनके मौत का निशाँ गहरे...

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जिंदगी और मेरे अंदाज़

ज़िन्दगी तुझे जीने के अंदाज़ बयां हो गए , तेरी खूबसूरती के देख कंहा कंहा निशाँ हो गए , कभी ठोकरों पे लिया, कभी वीरानो में दिया पांव जख्मी तेरे मेरी मंज़िल के निशाँ हो गए, वो भी था वक़्त जब तमन्नाओं की आंधी सी थी, जाने कितने लम्हे तेरी चाहत में फना हो गए,...

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अकेलापन (एक दोस्त की ख्वाहिश पर)

ये दुनिया का जो मेला है, यंहा हर एक मिलता अकेला है, कहने को तो महफ़िल भी है, महफ़िल में तन्हा एक दिल भी है, मिलता नहीं अब वो जो इस दिल से खेला है, जिसने लगा रखे हैं नकाबों पे नकाब, वो असली चेहरा भूल चूका ये भी एक झमेला है, सोचता है के कारवां है साथ, पर...

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तन्हाइयों की दास्ताँ

पहचानता हूँ शहर को फिर भी क्यूँ अनजान हूँ, रास्तों से गुजर चूका हूँ भूल चुका नादान हूँ , कुछ दूर चलता हूँ कारवां संग, फिर खुद को तन्हा कर के घूमता वीरान हूँ, महफ़िलों में दखल मेरा फिर भी मैं सुनसान हूँ, बहलाता हूँ मैं दिल सभी का, खुद का पर दिल ना बहले...

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चलो खुदाई का दर सजालें

गुजर जाना हर हद से खुदाई के तरानों में, ज़माने लग जाते हैं दोस्त, खुदा का दर सजाने में, सजा ले कोई भी दैरो - हरम तो क्या होगा, इबादत में लिखे लफ्ज़ गुनगुना ले तो क्या होगा, मज़ा तब है जब लफ्ज़ निकले खुदा की याद आने में, ऐसी सजावट है मिलती खुदा के ही दीवाने...

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आज की धड़कनें,

भोर के उजालों ने पैगाम ईश्वर का दिया, इंसान हमेशा रखे जलता इंसानियत का दिया, सलामों की इस दुनिया में एक सलाम यूँ भी कर डाला, जब भी हुआ उदास मन, आपकी दुआओं का काफिला निकाला, नज़राने देख मैं लाया हूँ तेरे मुस्कराने के , छोड़ ये अकेलापन अब हंस भी दे बहाने...

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पंजाब का रंग

बिना ढोल नगाड़े के सरदार सरदार कैसा, बिना ठुमकों के तो पंजाब है अत्याचार जैसा, कभी कभी ही पहुँचते हैं कदम वाहेगुरु के दर, गुरुबाणी के शब्द सुनकर हो जाता है प्यार एैसा, करता है सूरज हर सुबह हर जीव का सत्कार जैसा खालसा फ़तेह

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तिरंगा गरीब हाथों में

आज़ाद तिरंगा कब होगा, गरीब ना बच्चा जब होगा भारत का कोई गरीब बच्चा जब तिरंगा बेचता है, भारत की रज रज का साथी आवाम उसको देखता है, जाने कितनों ने वो जब आया कार के शीशे चढ़ाये, फिर भी वो मुस्कराकर उम्मीदों के सलाम ठोकता है, वजह क्या थी दो निवाले, तन ढकने को...

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धड़कनें रोज की

तेरी खामोशियों को सुनते हैं,लगा लेते हैं फिर दिल से चाहने वाले ेऐसे मेरे दोस्त मिलते हैं बड़ी मुश्किल से तोड़कर खुद को सम्हल जाना भी पड़ता हैं, महफ़िलों में कभी कभी अकेले मुस्कराना भी पड़ता है खुदा गुनाहों का हिसाब कर तो देता है, मगर सुधरने का मुकम्मल वक़्त...

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