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जीने का एक अंदाज़.... ये भी

गम से घबराता तो मैं भी रहा हूँ, नाउम्मीदी में उम्मीद लिए जी ही रहा हूँ, टूटना तो पत्थरों का नसीब है ही शायद, तराश दे कोई इस चाह में जहर भी पी रहा हूँ. नहीं बनना मुझे किसी मंदर की मूरत, मैं फकत रास्तों को मुकम्मल सी रहा हूँ, यूँ तो ज़िन्दगी के तजुर्बों...

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आज की धड़कने.......... (IV)

सुबह तेरे रंगों में से रंग अपने ले रहा हूँ, ख्वाब जो पूरा ना हुआ अधूरा ही तुझे मैं दे रहा हूँ, कहते हैं तू लौटा देती है मुकम्मल करके, झोलियाँ तेरी आबाद रहे दुआएं ये मैं दे रहा हूँ वो आजमाते हैं उस यकीन की हद तक, जँहा पहुंचकर भरोसे टूट जाया करते हैं ,...

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इश्क के अंदाज़ ये भी ...............

तू नज़र आ जाए इंतज़ार के लम्हे भी ये चाह रखते हैं, बाद मुद्दत तूने रुख किया तो है इस डगर का, हम डगर का शुक्रिया आवारगी में हजारों बार करते हैं, कभी रुकना कभी चलना कभी जुल्फों के अंदाज़ बदलना, तेरी हर अदा पर खुद को जख्मी हम यार करते हैं , तूने हम पर नज़र डाली...

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पंजाब का दर्द............ विदेशों से

पंजाब मेरे देश का वो परिवेश, जिससे शोभित था हर मन विशेष, गुरुओं की वाणियां और कौल सरदारो के, खाता था कसमें वक़्त भी वफादारों से, फिर आज एक दौर सा है चल पड़ा, हर दूसरा था पंजाब छोड़ विदेश निकल पड़ा, वो भी था गवारा के चलो कमाना था घर के लिए, कमाया भी वतन आया...

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आज की धड़कने ...........(III)

सुबह ने अंधियारे मिटा दिए है आज के, सूरज ने दे दिए जीवन में उजाले विश्वाश के, चलो बाँट लें ये पल पल दुआओं के एह्साश के, जब हुआ एह्साश ये फकत आपके अल्फ़ाज़ है मोहब्बत नहीं, दूरियों के दामन हमारे और भी थे करीब आ गए, रूबरू तो होते रहे थे हम मगर, फासले भी थे...

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हिन्द में पाकिस्तान के परचम फहराने का अंजाम

सर कलम कर देना होगा उस नामुराद खबीज़ का, जो हमारे वतन का खा पहन कर हो ना पाया ज़मीर का, तिरंगे के अलावा गर हाथों में पाक का परचम दिखे, हाथ काट दिए जाएँ, जिस्म टाँग दो चौराहे पर, सबक हो जाए गद्दारों के लिए, फौजियों को सलाम हो वीर का जय हिन्द

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वतन की कलम से .................

जब वतन में पनपने वाली समस्याओं से जूझता हुआ आम इंसान निराश होने लगे, खुद को कमजोर और असहाय महसूश करे तो और कुछ बदलने की चिंगारी हो जो दब रही हो, तब ये पंक्तियाँ उम्मीद है हौसला बढ़ा सकें ............. तरकश रखता हूँ दुआओं के , उम्मीदों के तीर रखता हूँ,...

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छूटा बचपन......... या इंसान की फितरत

ये भोलापन बचपन साथ क्यों ले जाता है, इंसान तो बड़ा हो जाता है, बड़प्पन छूट क्यों जाता है, कुछ हैं जिनके अल्फ़ाज़ अब भी निकलते होंगे दिल से, बचपन की नादानियां याद करके वक़्त ठहर क्यों जाता है, हर इंसान में खुदा का अंश होता जरूर है दोस्त, किसी में नज़र आता है...

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वतन के रखवालों के नाम

समंदर की सीमाओं पर डटे सैनिकों को सलाम है, जबां जबाँ पुकारती फकत वतन और तिरंगे का नाम है, लहरों और तूफानों ने जिनको है ये सीखा दिया, हर मुश्किल घडी में भी दुश्मन के इरादे करना नाकाम है, लहू का कतरा कतरा शहीदों का पुकारता बस अब नाम है, आसमा तुझ पर दस्तखत...

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