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कोई जानता यूँ है........ मुझे

मैं कतरा लिखता हूँ वो समंदर मानता है , ज़िन्दगी शायद वो मुझसे बेहतर जानता है, पिने को पीता हूँ अश्क बेतकल्लुफ होकर जब, वो मेरी हंसी को भी ग़मों का घर मानता है, चाहत की बातें वो करता रहता है अक्सर, मैं टूटता नहीं हूँ ये वो बेहतर जानता है, मेरे वज़ूद में जो...

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जन्मास्टमी पर व्यथा....... मन की

कान्हा तेरे रूप को आँखों में बसाकर अश्क बहाता हूँ मैं, इस तरह इस ज़मी को छू कर तेरे चरण सहलाता हूँ मैं, जाने कब उभर आये वो बीती सदियाँ करवटें लेकर, तेरी यादों का हर जन्मदिन पर तेरे कारवां सजाता हूँ मैं, देख मीरा को तो तू भी नहीं भुला होगा, जहर है जीवन...

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आज की धड़कने ....... (IX)

जंगलों को परिंदों ने छोड़ा तो है बेबसी में शायद, इंसा ने उनके बसेरे उजड़े घरौंदों की तलाश है शायद संघर्ष की दिशा का चयन गर सही ना हो पाये, तो फिर इंसान ता उम्र संघर्ष में ही बीती पाये, कभी पता भी नहीं चलता वक़्त के बहाव में, के हमने संघर्ष भी किया पल फ़िज़ूल...

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आज की धड़कने ......(VIII)

सरहदें मिटाने को हमने इंसान को है तैयार पाया, नहीं समझ पाये जो थे शैतान बेगुनाहों का जिसने था लहू बहाया तुझे हुस्न पर गुमान जबसे था हो गया, हर तरफ मौसम था बेजान हो गया, खुद को इतना तूने था मशहूर किया, चर्चा तेरे जज्बात का था खो गया देखा हो गया ना जलवा...

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एह्साश...... पाषाण के

इस पाषाण का उस धरा को सलाम है, जिसकी मिटटी मस्तक रही सदा, जिसने तराशा मंदर के लिए उसका इंसान नाम है, पर उसने पाया नहीं खुदा, मुझे संवारा गया अपनी सुविधाओं के लिए, मैं रखता गया खुद पर खुद को, आज देखता हूँ अट्टालिकाओं में मेरा नाम है, मेरे एहसासों को छूता...

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आज की धड़कनें .......(VII)

ना छेड़ इंसा तू इन नादान जीवों को, नहीं तू जानता इनके जख्मो और नीवों को, अगर तू प्यार देता इन्हे जाएगा, शेर भी तेरे आगोश में मुस्कराएंगा, और अगर तूने इनकी बेबसी पर है सितम ढाया, चींटी हो या वानर काफी है तुझे गिराने को तस्वीरें जहन की दास्ताँ बदल ना पाएंगी,...

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सलाम से ...... खताओं तक

अब ना दुआ होगी दोस्त ना सलाम, हम हैं खतावार हमें खताओं से फकत काम, खताओं की आरजू भी रखता ही होगा कोई, काफी दिन बीते लगा के किस्सा ना हुआ कोई मैंने खतायें छोड़ दी जबसे, उसने सजा ना दी कोई, यूँ लग रहा है बेमने से ही अपना बना कोई, आजाद कर लिया खुद को या आजाद...

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(रिटायरमेंट का.... दर्द)

कुछ को देखा जब उम्र की एक दहलीज़ के पार, काम से मिली थी निजात वक़्त गुजरता था साथियों के साथ, सोचा था उसने वो दिन भी आएंगे उसके, जब गुजरेंगे दिन कुछ इत्मीनान कुछ सकूँ के उसके, वो दिन आ तो गया जब काम से थे रिटायर हो गए, पर जब देखा तो पाया घर वालों को अजीब...

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ठेस लगे........ जज्बात

बहुत दूर जी कर सोचा तो था पाया हमने, कोई ठेस भीतर ही भीतर सुलग रही है यूँ, तमन्नाएँ पूरी होकर भी लगती है राख, एक चिंगारी फूंक रही है तेरी मोहब्बत ज्यूँ होने को तो सब कुछ था ही मगर, वो जो तीखी बात कह दी थी रह गयी है क्यूँ

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