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चिराग घर का यूँ रौशन हो

चिराग रौशन रहे घर का सबके, इंसानियत का लहू बहे रग में सबके, ना हो दौलत का कभी नशा हावी, इंसान को इंसान समझे जां के सदके ज़िन्दगी यूँ गुजरे के नाम हो उसका, ज़ुबाँ पे सबके

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मोहब्बत के रंग जुदा जुदा

हुस्न उलझन है ये जानते सब हैं, मुहब्बत में लुटे बिना मानते कब हैं, चाहे जितना पूछ लो हुस्न वालों से, वो अपनी अदाएं सम्हालते कब हैं बिना ेऐतबार के वादे भी किये जाते हैं, कुछ वो निभाते हैं कुछ हम निभाते हैं मोहब्बत के बंधन की दास्ताँ निराली ही मिलेगी, यादें...

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हिन्द सरताज कलाम साहेब और उनके ख़ानदान के नाम

सज़दे में सर खुद ब खुद झुक जाता है, जब इंसान इंसानियत निभाता जाता है इंसानियत से हर दिल का गहरा नाता है, मजहब दीवार नहीं होता कंही ये तो दिलों को जोड़ने का पुराना साँचा है, वो जो फकीरी में गुजर करने पे हैं आमादा, फरिश्तों के ओहदों से उन्हें ही नवाजा जाता...

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मोहब्बत खेल नसीबों का

शोहरतें आपकी खिदमत में बसर हैं , चाहतो का कौन जाने कितना असर है, दूर तो हो पर करीब रहना, मोहब्बत में हमारा नसीब रहना, ये इल्तज़ा हमारी समझ कर, हर दम खुदा सा तुम करीब रहना सफर इश्क का दर्द से शुरू करता हूँ, वो जो लूटते हैं सकूँ उन पर गुरुं करता हूँ, इश्क...

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खुदा तेरे अंदाज़ अलग

एक तो खुदा तेरी ये दुनिया उस पर मरे ज़मीर वाले ये लोग चंद सिक्कों के लिए औकात बताते ये लोग माना के मंदिर ना मस्जिद जाता मैं तूने तो देखा दिल से सज़दे निभाता हूँ मैं तेरा भी साथ नहीं या है क्या समझूँ मैं, देख कर तो लगता तू भी साथ निभाता इन ज़मीर वालों का...

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स्याही के अंदाज़,

जाने कितने लफ़्ज़ों के मानो को अंजाम दे डाले, बिन लिफाफों के ही दिलों के पैगाम दे डाले, जाने कितने लफ़्ज़ों के मानो को अंजाम दे डाले, बिन लिफाफों के ही दिलों के पैगाम दे डाले, स्याही की दरकार होती है जज्बात लिखने को आपकी स्याही से जाने कितनो ने नाम बदल डाले...

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कण और बूँद

धरा का जो कण एक बूँद का प्यासा है, वो कण मिटटी का दिया हुआ दिलासा है धरा का जो कण एक बूँद का प्यासा है, वो कण मिटटी का दिया हुआ दिलासा है पत्तों पर ठहरी हुई बूंदों का इंतज़ार, जाने किस कण की प्यास बुझाता है, प्रतीक्षा में बूँद भी है और कण भी है, धरा पर...

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खुद को समेटने का वक़्त,

टूट कर बिखरने से पहले खुद को जोड़ लिया है, इस ज़िन्दगी ने बिन तेरे बेहतर मोड़ लिया है, टूट कर बिखरने से पहले खुद को जोड़ लिया है, इस ज़िन्दगी ने बिन तेरे बेहतर मोड़ लिया है, कसर नहीं रखी तूने उजाड़ने में उम्मीदें , तभी तुझसे रिश्ता कुछ हद तक तोड़ लिया है

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खामोशियों के लफ्ज़

खामोशियों के लफ़्ज़ों को पढ़ने को कह रहे हो, हमारी तन्हाइयों में जाने कब से रह रहे हो, खामोशियों के लफ़्ज़ों को पढ़ने को कह रहे हो, हमारी तन्हाइयों में जाने कब से रह रहे हो, ये बात जुदा है मेरे अफ़साने से, जाने क्या लिख रहे हो, जाने क्या कह रहे हो

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