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जंग दोस्ताने में

बन्दूक की गोली सा रूठ जाते हैं दोस्त, रूठना है कंही , निशाना कंही लगाते हैं दोस्त, यूँ तो जंग का इरादा होता है कभी कभी, पर जुबा की तीरंदाज़ी रोज दिखाते हैं दोस्त, कुछ ेऐसे भी मिल पड़े हैं इस राह में हमसे, शोहरत और दौलत के ढेर पर खड़े हाथ मिलाते हैं दोस्त,...

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जिन्दगी एक नज़र यूँ भी

जीते जीते एक पल को ठहर गया हूँ मैं, ज़िन्दगी तुझे क्यों लगा के ज़ी गया हूँ मैं, अब ढोता हूँ तेरे दिए लम्हों को मैं , दुनियादारी तेरे भरोसे भी कब रहा हूँ मैं माना के हर तरफ शोर है तेरे होने का, तू नहीं है ये सोच कर भी तो जी रहा हूँ मैं, चंद रौनकें, चंद निवाले...

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(झुलसते जज्बात)

तितलियों के पंख झुलश गए होंगे, जब सूरज ने तीखे अल्फ़ाज़ कहे होंगे, हवाएँ भी थम सी गयी होंगी , बादल जब तक ना बरस गए होंगें, मैं तो बेबस था पीना ही था ज़िन्दगी का जहर , तेरे दिलासे भी क्या बेवजह रहे होंगे, कभी जाना नहीं किसी ने हाल दिल का, हमने भी तो आखिर...

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दोस्त मान जाए

तेरे रूठ जाने से दर्द मेरा बढ़ ही गया होगा, जाने वो भी क्या दौर होगा, जिसमे दोस्त का दोस्त हमदर्द रहा होगा

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चिराग घर का यूँ रौशन हो

चिराग रौशन रहे घर का सबके, इंसानियत का लहू बहे रग में सबके, ना हो दौलत का कभी नशा हावी, इंसान को इंसान समझे जां के सदके ज़िन्दगी यूँ गुजरे के नाम हो उसका, ज़ुबाँ पे सबके

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मोहब्बत के रंग जुदा जुदा

हुस्न उलझन है ये जानते सब हैं, मुहब्बत में लुटे बिना मानते कब हैं, चाहे जितना पूछ लो हुस्न वालों से, वो अपनी अदाएं सम्हालते कब हैं बिना ेऐतबार के वादे भी किये जाते हैं, कुछ वो निभाते हैं कुछ हम निभाते हैं मोहब्बत के बंधन की दास्ताँ निराली ही मिलेगी, यादें...

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हिन्द सरताज कलाम साहेब और उनके ख़ानदान के नाम

सज़दे में सर खुद ब खुद झुक जाता है, जब इंसान इंसानियत निभाता जाता है इंसानियत से हर दिल का गहरा नाता है, मजहब दीवार नहीं होता कंही ये तो दिलों को जोड़ने का पुराना साँचा है, वो जो फकीरी में गुजर करने पे हैं आमादा, फरिश्तों के ओहदों से उन्हें ही नवाजा जाता...

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मोहब्बत खेल नसीबों का

शोहरतें आपकी खिदमत में बसर हैं , चाहतो का कौन जाने कितना असर है, दूर तो हो पर करीब रहना, मोहब्बत में हमारा नसीब रहना, ये इल्तज़ा हमारी समझ कर, हर दम खुदा सा तुम करीब रहना सफर इश्क का दर्द से शुरू करता हूँ, वो जो लूटते हैं सकूँ उन पर गुरुं करता हूँ, इश्क...

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खुदा तेरे अंदाज़ अलग

एक तो खुदा तेरी ये दुनिया उस पर मरे ज़मीर वाले ये लोग चंद सिक्कों के लिए औकात बताते ये लोग माना के मंदिर ना मस्जिद जाता मैं तूने तो देखा दिल से सज़दे निभाता हूँ मैं तेरा भी साथ नहीं या है क्या समझूँ मैं, देख कर तो लगता तू भी साथ निभाता इन ज़मीर वालों का...

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