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आज की धड़कनें,

भोर के उजालों ने पैगाम ईश्वर का दिया, इंसान हमेशा रखे जलता इंसानियत का दिया, सलामों की इस दुनिया में एक सलाम यूँ भी कर डाला, जब भी हुआ उदास मन, आपकी दुआओं का काफिला निकाला, नज़राने देख मैं लाया हूँ तेरे मुस्कराने के , छोड़ ये अकेलापन अब हंस भी दे बहाने...

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पंजाब का रंग

बिना ढोल नगाड़े के सरदार सरदार कैसा, बिना ठुमकों के तो पंजाब है अत्याचार जैसा, कभी कभी ही पहुँचते हैं कदम वाहेगुरु के दर, गुरुबाणी के शब्द सुनकर हो जाता है प्यार एैसा, करता है सूरज हर सुबह हर जीव का सत्कार जैसा खालसा फ़तेह

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तिरंगा गरीब हाथों में

आज़ाद तिरंगा कब होगा, गरीब ना बच्चा जब होगा भारत का कोई गरीब बच्चा जब तिरंगा बेचता है, भारत की रज रज का साथी आवाम उसको देखता है, जाने कितनों ने वो जब आया कार के शीशे चढ़ाये, फिर भी वो मुस्कराकर उम्मीदों के सलाम ठोकता है, वजह क्या थी दो निवाले, तन ढकने को...

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धड़कनें रोज की

तेरी खामोशियों को सुनते हैं,लगा लेते हैं फिर दिल से चाहने वाले ेऐसे मेरे दोस्त मिलते हैं बड़ी मुश्किल से तोड़कर खुद को सम्हल जाना भी पड़ता हैं, महफ़िलों में कभी कभी अकेले मुस्कराना भी पड़ता है खुदा गुनाहों का हिसाब कर तो देता है, मगर सुधरने का मुकम्मल वक़्त...

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इश्क की मुलाकातें

चाहत में यादों की बसर तो हो ही जाती है, नशे में मोहब्बत के खुमारी हो ही जाती है, धड़कता है दिल ेऐसे उनके रूबरू होने पर, हर धड़कन फकत उनको ही गुनगुनाती है, मगर जब वो लौटने की बात करते हैं, दिल डूबने लगता है उदासी छा सी जाती है , फिर वो मुस्करा कर करते हैं...

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बरसते बादल

बादलों की टोलियां आसमान से ही आती है, बूंदें बरसातों की रह रह के गुनगुनाती हैं, धरा चल थोड़ा तुझको भिगालें हम, हलकी चले पवन तो पत्ते पत्ते को सजा लें हम, बूंदें जो ठहर गयी पेड़ों की शाखों पर, ज़मी के कुछ जर्रों की प्यास बुझा जाती हैं जाने सहरा में कहा बरसातें...

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चाहतों से सांसें

कहते हैं चाहतें हैं तब सांसें चल रही हैं नहीं तो जाने कबसे ज़िन्दगी सम्हल रही है सांसों से कहना चाहतों ने भी इंतज़ार किया है, वो चलती रहें तभी तो उनके बसेरों से प्यार किया है

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शहीदों की बेबसी

सर पर कफ़न भी बेमानी बांध लेते हैं, वतन की खातिर जो तिरंगे पे जान देते हैं, हाथों में बेड़ियां पहने वो राजनीती की, हिन्द का जनूँ लिए हिन्द पे जान देते हैं, नमन है ेऐसे वीरों को माँ भारती तेरे, जो मिट जाते हैं तेरे लिए लहू को मान देते हैं जय हिन्द

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सलाम का अंदाज़ जुदा

दुआ से सलाम तक नमस्ते से प्रणाम तक, आदाब से राम राम तक, गुड मॉर्निंग से गुड नाईट तक बनता है सब कुछ, मगर आपका हक़ बनता है, गुलजार से ख़य्याम तक सत्श्रीकाल जी

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