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16 Sep

पागलपन की...... सजा

Published by Sharhade Intazar Ved

पागलपन की...... सजा

पागलपन का दर्द भी क्या अजीब दर्द है,

पागल जिसे समझता नहीं जाने कौन हमदर्द है,

कभी कभी कुछ होते हैं जो छूट जाते हैं इससे,

मगर जब याद आते हैं लम्हे सिहर उठते बेदर्द हैं,

खुदा की सज़ाओं में से ये सज़ा निराली है,

दुनिया से रहता है बेखबर एक अजीब ही गर्द है,

मोहब्बत का पागलपन हुस्न कबूल कर लेता है,

पर खुदा का बनाया पागल बेमाने ही साँस लेता है,

ज़िन्दगी का ये पहलु जाने खुदा क्यूँ देता है,

मौत से बत्तर ज़िन्दगी सजाओं की ही हमदर्द है,

अरमानो का कुचल दिया जाना,

तन्हाइयों में बिन चाहे बस जाना,

घुट घुट कर जीना फिर एक दिन पागल हो जाना,

अजीब सा होगा ये भी सफर हर किस्सा सर्द सर्द है

पागलपन का दर्द भी क्या अजीब दर्द है

Comment on this post

monika 09/22/2015 11:10

इस रचना को पढ़ कर बस यही कहना चाहूंगी कि
आप एक सच्चे कलाकार हैं