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16 Sep

ज़मी पर सरहदें ......ना बनें

Published by Sharhade Intazar Ved

ज़मी पर सरहदें ......ना बनें

सरहदें बनायीं गयी धरा को बाँट बाँट कर,

मुल्क खुद परेशां होगा सरहद लहू से पाट कर,

ज़िंदगियाँ वक़्त से पहले ही फना होती रहीं,

ज़मी भी शायद हैराँ हो इंसा के इस जज्बात पर,

यूँ तो मिटटी मिटटी में फर्क होता नहीं कोई,

जिसमें तू पैदा हुआ उस मिटटी से भी कभी तू बात कर,

कहेगी संसार की हर सरहद है जख्म उसके हालत पर,

जख्म पर कभी मिटटी लगा कर देख तू इंसा,

सकूँ पा जाती है रूह मत बहा सरहद पर लहू नादां,

जुर्म ऐसा क्यों करता है इंसा इस हंसी कायनात पर

Comment on this post

monika 09/22/2015 11:21

इस रचना को पढ़ कर एक बार फिर यही कहना चाहूंगी कि आप एक सच्चे कलाकार हैं। सच्चाई को दर्शाती हुयी बहुत सुन्दर रचना।
कोई जवाब नही -ना तो इस रचना का , ही आप की कलम का और ना ही आप का।

om prkash 09/18/2015 02:18

क्या इतनी ह्रदय विदारक लिखते हैं कि दिल छलनी छलनी हो जाये।कैसे तारीफ करें की शब्द ही नहीं।
अंदाजे बया खूब है

ved 09/18/2015 16:22

aabhaar aapka Om Bhai