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16 Sep

आईनों का.............. दर्द

Published by Sharhade Intazar Ved

आईनों का.............. दर्द

आईनों का दर्द कोई समझेगा क्या,
अक्श अपना दिखाई ना दे कोई बदलेगा क्या,

सूरतें दिखती तो हैं ख़ूबसूरत मगर,
नकाब कितने हैं एक चेहरे पर कोई कहेगा क्या,

टूटता है जब कोई तब नकाब भी टूट जाता है,
आईने के टुकड़ों में हर टूटा अक्श नज़र आता है,

चूर आईनों सी भी होती है हालत कोई समझेगा क्या,
सच के आईनों की जबानी भी कोई कहेगा क्या,

वक़्त की मुट्ठी ने जब सच के आईनों को है तोड़ा,
फरेब के बहते लहू से कोई अब सच कह लेगा क्या,
आइनों का दर्द कोई समझेगा क्या

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