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09 Sep

आज की धड़कने .........(XIII)

Published by Sharhade Intazar Ved

आज की धड़कने .........(XIII)

सुबह के उजियारे प्रेम का सन्देश ले आये,
इंसान के अंधेरों की जितनी हो प्यास बुझ जाए,
इंसानियत हर घडी ख़ुशी के गीत गाये,
दोस्तों की ज़िंदगानी दोस्ती में बीत जाए,

साथ गुजारे वक़्त की कसक रह ही जाती है रिश्तों की,
दूर रहते है और हमेशा याद आते हैं ये ज़मी है रिश्तो की,
बचपन गुजारा हो साथ, उनके जुदा होते नहीं जज्बात,
प्यार को याद करते हो किसी को बेवफाई याद आती है रिश्तों की,

कुछ होंगे जो सोचते हों इससे ही बसर हो जाए,
जानते हैं ना होगी फिर भी शायद कंही असर हो जाए,

मैं उस काम में खुद को शामिल करना चाहता हूँ,
आपकी हो इज़ाज़त तो आपकी तरासगी में ढ़लना चाहता हूँ,

एै रात अपने दामन में अब हमको जगह दे,
सकूँ की घड़ियों में नींद आये पनाह दे,
ख्वाबों का आना गर हो करम से तेरे,
दिन के उजालों में ख्वाब पूरा हो हमको दुआ दे

Comment on this post

Anil juneja 09/10/2015 03:42

Mai us kaam me khud ko shaamil krna chahta hun
Aap ki ijaazt ho to aap ji traashgi me dhalna chahta hun
Waah kya andaaz hai .bahut khoob

ved 09/10/2015 12:41

sukriya anil Bhai

Monika 09/10/2015 02:14

Atyant utkrishath rachna.
Waah kyaa baat hai
Subah ke ujiyaare prem ka sandesh le aayen...insaan ke andhero ki pyaas bhujh jaaye....insaaniyaat hr ghadi khushi ke geet gaaye . Bahut sunder

ved 09/10/2015 12:40

sukriya monika ji