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09 Sep

बचपन से मज़दूरी करवाने का......... जुर्म

Published by Sharhade Intazar Ved

बचपन से मज़दूरी करवाने का......... जुर्म

नन्हे कन्धों पर रख देते हैं बोझ,
चंद दौलतमंद अपने मतलब के लिए,

दौलत के नशे में हो जाते हैं अंधे,
अपने गोरख धंधे के लिए,

किसी बचपन पर जुर्म है मज़दूरी,
जो करवा रहा है उसकी आत्मा नहीं पूरी,

फिर इन्ही में कुछ होते हैं जो दान देते हैं,
मंदर मस्जिदों के स्तम्भो पर अपने नाम देते हैं,

तभी ढह जाते हैं वो खुदा के दर सैलाबों में,
आखिर कैसे बसर कर ले भगवन एैसे बेगारों में,

मत बनाओ मज़दूर बचपन को कुछ अपने बच्चों को देखो,
इंसानियत को ना करो रुसवा एक बार मासूमियत को देखो,

खुदा तेरे हाथों से उनका हो सकता है मुस्तकबिल बना दे,
बस एक बार तू खुद के बच्चों और उनको बराबर मिला दे,

जीवन दिया है खुदा ने नादाँ इसका कुछ तो सीला दे,
कुछ तो सीला दे के खुद को चल इंसान बना ले

Comment on this post

Monika 09/10/2015 01:17

!! Waah bahut sunder....ke khud ko chal insaa bnaa le.
Mukabla nhi aap ka ka srl bhasha or sunder bhav liye taarif e kabil rachna....log aisa ghinona kaam na jaane kr bhi kaise lete hai .in bacho me to khuda bsta hai

ved 09/10/2015 16:57

ji jarur khudai bachpane men hi to basar karti hai , Sukriya Monika ji