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06 Sep

जन्मास्टमी पर व्यथा....... मन की

Published by Sharhade Intazar Ved

जन्मास्टमी पर व्यथा....... मन की

कान्हा तेरे रूप को आँखों में बसाकर अश्क बहाता हूँ मैं,
इस तरह इस ज़मी को छू कर तेरे चरण सहलाता हूँ मैं,

जाने कब उभर आये वो बीती सदियाँ करवटें लेकर,
तेरी यादों का हर जन्मदिन पर तेरे कारवां सजाता हूँ मैं,

देख मीरा को तो तू भी नहीं भुला होगा,
जहर है जीवन के अमृत कब तुझे बताता हूँ मैं,

चाहतें इस जन्हा में तेरी ही दी अमानते हैं यक़ीनन,
चाहतों से अलग बसकर भी चाहतें निभाता हूँ मैं

तूने कभी अश्क बहाये तो थे सुदामा के लिए,
जानता ही होगा अब सुदामा का नाम मिटाता हूँ मैं

तेरा दर अब कँहा मिलता है इस कायनात मैं,
मुफलिसी में रह कर भी सिंहासनों को आजमाता हूँ मैं

Comment on this post

monika 09/08/2015 14:16

देख मीरा को तो तू भी नहीं भुला होगा,
जहर है जीवन के अमृत कब तुझे बताता हूँ मैं,
hirdye sparshi sach me dil ko chhoo gyi ....



चाहतें इस जन्हा में तेरी ही दी अमानते हैं यक़ीनन,
चाहतों से अलग बसकर भी चाहतें निभाता हूँ मैं
bahut khoob.

तूने कभी अश्क बहाये तो थे सुदामा के लिए,
जानता ही होगा अब सुदामा का नाम मिटाता हूँ मैं
kmaal hai kmaal hai..

ved 09/08/2015 17:04

bahut bahut shukriya Monika ji

anil juneja 09/07/2015 08:22

कान्हा तेरे रूप को आँखों में बसाकर अश्क बहाता हूँ मैं,
इस तरह इस ज़मी को छू कर तेरे चरण सहलाता हूँ मैं,
waah kyaa baat hai...bahut sunder

ved 09/08/2015 16:57

thanks anil bhai