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03 Sep

आज की धड़कने ....... (IX)

Published by Sharhade Intazar Ved

 आज की धड़कने ....... (IX)

जंगलों को परिंदों ने छोड़ा तो है बेबसी में शायद,
इंसा ने उनके बसेरे उजड़े घरौंदों की तलाश है शायद

संघर्ष की दिशा का चयन गर सही ना हो पाये,
तो फिर इंसान ता उम्र संघर्ष में ही बीती पाये,
कभी पता भी नहीं चलता वक़्त के बहाव में,
के हमने संघर्ष भी किया पल फ़िज़ूल भी गंवाए

खुलकर हंसना थोड़ा मुस्कराना यूँ बेहतर जीना,
हमने सिख लिया दोस्त तेरे संग का जाम पीना


गम बढ़ाने का दोस्तों जब से है तजुर्बा हो गया,
ज़माने वालों यकीं मानो गम तबसे खफा हो गया,
ख़ुशी भी वीराने में है अब तो बुलाने लगी,
जब से अश्क मेरी रूह का है आइना हो गया

एै रात कुछ हंसी ख्वाब किनारे रख के सकूँ से नींद आ जाए ,
थोड़ा तुझे भी करार आये कुछ मुझे भी करार आ जाए

Comment on this post

ajay kumar 09/04/2015 12:09

अपनी स्वार्थपरस्ती के कारण परिंदो के बसेरे उजाड़ने और उनकी बेबसी का सुन्दर उल्लेख

बहुत खूब Sharhade Intazar Ved ji

ved 09/04/2015 17:45

shukriya Ajay Bhai