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01 Sep

आज की धड़कने ......(VIII)

Published by Sharhade Intazar Ved

आज की धड़कने  ......(VIII)

सरहदें मिटाने को हमने इंसान को है तैयार पाया,
नहीं समझ पाये जो थे शैतान बेगुनाहों का जिसने था लहू बहाया

तुझे हुस्न पर गुमान जबसे था हो गया,
हर तरफ मौसम था बेजान हो गया,
खुद को इतना तूने था मशहूर किया,
चर्चा तेरे जज्बात का था खो गया
देखा हो गया ना जलवा फीका यार का,
अब कहा दीवाने लेंगे नाम प्यार का

मौताधिपति (यमराज) के हाथों में डोरियाँ सभी के झूलों की,
शोषण में है छवि जिनकी उनके गलों में माला है फूलों की,
घनश्याम निहारे है बेबसी धन के मारों के फ़िज़ूल उसूलों की

चल रात रख ले आरजुएं मेरी बदले में कुछ तू नींद दे दे,
सुबह सबेरे उठा कर मुझे तू आरजूओं भरी उम्मीद दे दे

Comment on this post

om prkash 09/02/2015 19:37

Slaam sahab , rachna ka kr hissa hr kissa behad sunder . Sharhade ji aap ne itni sunder rachna likhi - waah .tarif e kabil . Lekin taarif kru kya uski jisne tume bnaya

ved 09/03/2015 17:31

shukriya Om bhai

manju 09/02/2015 11:51

hmesha ki trhe bahut badia....

ved 09/03/2015 17:31

shukriya manju ji