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31 Aug

(रिटायरमेंट का.... दर्द)

Published by Sharhade Intazar Ved

(रिटायरमेंट का.... दर्द)

कुछ को देखा जब उम्र की एक दहलीज़ के पार,
काम से मिली थी निजात वक़्त गुजरता था साथियों के साथ,

सोचा था उसने वो दिन भी आएंगे उसके,
जब गुजरेंगे दिन कुछ इत्मीनान कुछ सकूँ के उसके,

वो दिन आ तो गया जब काम से थे रिटायर हो गए,
पर जब देखा तो पाया घर वालों को अजीब सिकवे हो गए,

कहते पाया के अब ये घर पर रहेंगे,
हमारे वो कमाएंगे ये मौज करेंगे,

कितना बेबस आज हो गया
जिसे पाला उसके निवालों को रो गया

फिर खुद को उठा कर उम्र की दूसरी दहलीज़ पर,
निकाल दिया खोजने काम जमीर की खीज पर,

वक्त कितना बदल गया चलते हुए वो सोचता था,
बुजुर्ग का किरदार वो जमाना अब कहा बोलता था,
खुदा शायद नसीब वालों के ही घरों में डोलता था

Comment on this post

om prkash 09/02/2015 19:20

Bahut sarthk rachna .Rachna ke sath-sath chitr bhi bahut sarthak , dil kr dard ko darshaataa hus

ved 09/03/2015 17:33

shukria Om bhai

monika 09/01/2015 18:36

Bahut khoob.Retirement ke baad ka hirdye sprashi , rongte khade kr dene waala , bude logo ke prti karuna ka bhav bhar dene wala jeewant chitran

ved 09/01/2015 18:45

shukriya Monika ji

monika 09/01/2015 18:36

Bahut khoob.Retirement ke baad ka hirdye sprashi , rongte khade kr dene waala , bude logo ke prti karuna ka bhav bhar dene wala jeewant chitran