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18 Aug

आज की..... धड़कने (II)

Published by Sharhade Intazar Ved

आज की..... धड़कने (II)

सुबह ने दुआओं के द्वार खोले हैं,
सूरज ने पहनाये किरणों के चोले हैं,
पवन लहरा रहा है आँचल धरा का,
पंछियों ने चहचहाकर यारों के सत्कार बोले हैं,

उनका कहना है के सज़ाएं बाँट लो चलो ख़्वाबों में आकर,
हक़ीक़त में सज़ाएं बाँट कर ख्वाबों की बात करते हैं ,
मुस्कराते हैं हम के दफ़न किसी के यूँ जज्बात करते हैं,

हम दरख्तों के थे एहसानमंद हो गए,
जबसे थी शाखों पत्तों से दोस्ती हुई,
छाँव का था सिला कुछ यूँ नसीब हुआ,
दरख़्त पतझड़ को थे रजामंद हो गए

रात फिर आई के सुबह तक मुझे थाम ले,
आ मेरी प्यास बुझा बढ़ के बेखुदी का जाम ले

Comment on this post

ajay kumar 08/22/2015 16:30

Khubsurat alfaz...gr8 .,

ved 08/23/2015 16:57

Thanks Ajay Ji

sheetal kaushik 08/20/2015 14:14

aarambh se ant tk bahut khoob

lekin antim do panktia srvotam

"रात फिर आई के सुबह तक मुझे थाम ले,आ मेरी प्यास बुझा बढ़ के बेखुदी का जाम ले " kin shabdo me taarif kru ,samajh nhi aa raha

ved 08/20/2015 18:03

tahe Dil se shukriya aapka Sheetal ji