Overblog Follow this blog
Edit post Administration Create my blog
09 Aug

धड़कनें रोज की

Published by Sharhade Intazar Ved

धड़कनें रोज की

तेरी खामोशियों को सुनते हैं,लगा लेते हैं फिर दिल से
चाहने वाले ेऐसे मेरे दोस्त मिलते हैं बड़ी मुश्किल
से

तोड़कर खुद को सम्हल जाना भी पड़ता हैं,
महफ़िलों में कभी कभी अकेले मुस्कराना भी पड़ता
है

खुदा गुनाहों का हिसाब कर तो देता है,
मगर सुधरने का मुकम्मल वक़्त भी देता
है

तोहफे में जज्बातों के नज़राने रख दिए हमने,
दोस्ती के दामन में वफ़ा के तराने रख दिए हम
ने

नींदों में ख्वाबों के बस ेऐसे ही ठिकाने हों,
जंहाँ बस केवल फरिश्तों के आने जाने ह
ों

Comment on this post

ajay kumar 08/23/2015 16:56

कमाल कमाल कमाल्ल्ल

ekta 08/16/2015 02:55

तोड़कर खुद को सम्हल जाना भी पड़ता हैं,--Sharhade Intazar Ved ji maaf krna agr mai aap ki jgh hoti to likhti--tootne k baad सम्हल जाना भी पड़ता हैं,...
bahut badia likha hai aap ne

ekta 08/16/2015 02:51

तेरी खामोशियों को सुनते हैं,लगा लेते हैं फिर दिल से
चाहने वाले ेऐसे मेरे दोस्त मिलते हैं बड़ी मुश्किल से
waah waah kya baat hai ....Sharhade Intazar Ved ji kyaa aajkl bhi aise dost milte hain

om prkash tiwari 08/12/2015 02:35

kya baat hai !

ved 08/12/2015 07:53

Sukriya Om ji

arun kumaar 08/10/2015 12:32

lajwaab shayri sir


Zikar Hua Jab Khuda Ki Rehmaton Ka;
Humne Khud Ko Khushnaseeb Paya;
Tamanna Thi Ek Pyaare Se Dost Ki;
Khuda Khud Dost Bankar Chala Aaya!

ved 08/10/2015 18:43

Bahut khoob Arun Bhai