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08 Aug

(झुलसते जज्बात)

Published by Sharhade Intazar Ved

(झुलसते जज्बात)

तितलियों के पंख झुलश गए होंगे,
जब सूरज ने तीखे अल्फ़ाज़ कहे होंग
े,

हवाएँ भी थम सी गयी होंगी ,
बादल जब तक ना बरस गए होंगें
,

मैं तो बेबस था पीना ही था ज़िन्दगी का जहर ,
तेरे दिलासे भी क्या बेवजह रहे होंगे
,

कभी जाना नहीं किसी ने हाल दिल का,
हमने भी तो आखिर सितम सहे होंग
े,

कहते हैं मुकम्मल हो जाती है दोस्ती,
क्या हमारी दोस्ती में तितलियों से रंग रहे हों
गे

Comment on this post

ajay kumar 08/23/2015 16:50

सुभान अल्लाह !!!

manju 08/08/2015 12:40

very nice

manju 08/08/2015 12:40

Pathar ki hai duniya jazbaat nahi smjti Dil me kya hai baat, woh baat nahi smjti
Tanha to chand bhi hai sitaro k beech magarChand ka dard yeh raat nahi samjti.