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04 Aug

खुदा तेरे अंदाज़ अलग

Published by Sharhade Intazar Ved

खुदा तेरे अंदाज़ अलग

एक तो खुदा तेरी ये दुनिया
उस पर मरे ज़मीर वाले ये लोग
चंद सिक्कों के लिए औकात बताते ये लोग
माना के मंदिर ना मस्जिद जाता मैं
तूने तो देखा दिल से सज़दे निभाता हूँ मैं
तेरा भी साथ नहीं या है क्या समझूँ मैं,
देख कर तो लगता तू भी साथ निभाता इन ज़मीर वालों का
जो मोहताज़ था वो मोहताज़ रह ही गया निवालों का.
तू भी दीवाना हो गया शायद मस्जिद और शिवालों का,
तभी इंसान भूल गया इंसानियत इबादत के ख्यालों का
कंही मैं नास्त
िक ना हो जाऊं

Comment on this post

anil juneja 08/27/2015 18:26

बहुत खूब।बहुत क़ीमती लाइने हैं ।

ajay kumar 08/23/2015 16:44

अद्भुत लेखन है।

ekta 08/16/2015 02:48

"बिंदी 1 रुपये की आती है व ललाट पर लगायी जाती है।
पायल की कीमत हजारों में आती है पर पैरों में पहनी जाती है।
इन्सान आदरणीय अपने कर्म से होता है, उसकी धन दौलत से नहीं।

ekta 08/16/2015 02:47

nyc

madhu 08/10/2015 13:55

Wow....wakai aatma hilane wali panktiyaan

ved 08/10/2015 18:45

Thanks Madhu ji